Friday, June 2, 2017

युद्ध लाभ का सौदा

युद्ध लाभ का सौदा

बचपन से सुनते आये हैं काश्मीर तो क्या देंगें - लाहौर करांची ले लेंगें। और अभी कुछ समय पहले ही हमारे माननीय प्रधानमंत्री ने बोला “या तो खून बहेगा या पानी।” तो ऐसा लगता है कि हमारे देश के लोग और यहाँ के हुक्मरान पाकिस्तान से युद्ध के लिए अपने आप को तैयार कर रहे हैं। लोग समय समय पर यह भी कहते रहे है कि अगर भारत के सब लोग एक साथ सुसु भी कर दें तो पाकिस्तान में बाढ़ आ जाए(ये अलग बात है कि इस काम में तकनीकी समस्या आएगी)

तो पहला सवाल तो ये है कि युद्ध क्यों और कब लड़ा जाना चाहिए - तो आज तक का ऐतिहासिक अनुभव देखें तो पता चलता है कि युद्ध तीन प्रमुख कारणों से लड़ा जाता है पहला - सम्पदा के लिए दूसरा - गुलामों के लिए और तीसरा - अहंकार के लिए। पर अब ऐसा लगता है की युद्ध के नाम की जरुरत आजकल चुनाव जीतने के लिए भी होने लगी है।

चलो कोई बात नहीं दूसरी बात पर आते हैं तो बात यह है कि आज के समय में अगर युद्ध हों तो क्या हो तो उदाहरण के लिए आज चीन ये सोच ले कि उसे अमेरिका पर हमला करना है तो वहां का सबसे समृद्ध राज्य है कैलिफ़ोर्निया और कैलिफोर्निया का सबसे समृद्ध शहर है सिलिकॉन वेली और चीन ने हमला करके उसे जीत लिया तो चीन को वहां क्या मिलेगा कुछ बड़ी बड़ी कंपनियों के खाली ऑफिस और कुछ नहीं फिर जीत के क्या फ़ायदा। मूल बात यह है कि आजकल सम्पदा बुद्धि का हिस्सा बन गयी है जो कोई व्यक्ति दूसरे व्यक्ति की सिर्फ प्रेम और बंधुत्व से ही जीत सकता है। प्राकृतिक सम्पदा के लिए युद्ध समझ आता है पर बौद्धिक सम्पदा के लिए युद्ध निरर्थक हैं । और गुलामों की मंडियां आज कल बंद हो गयी है।

तीसरी बात सबसे महत्वपूर्ण है वह ये कि मान लो भारत पाकिस्तान को जीत ले फिर क्या होगा?

हमारी जनसँख्या एकदम से बढ़ जायेगी( अगर हमने 19 करोड़ लोगों को गोली से नहीं उड़ाया तो)

पाकिस्तान के पास प्राकृतिक सम्पदा पहले ही नहीं है तो भारत के ऊपर दबाव बढ़ जाएगा।

युद्ध में जो सैनिक मरेंगें उनकी जिम्मेदारी कौन कौन देशभक्त ले सकता है ??

युद्ध की वजह से जो आर्थिक भार देश जी जनता पर आएगा उससे भारत और गरीब जाएगा।

तो भाइयों और बहिनों कृपया पाकिस्तान से जंग करो तो पहले थोड़ा सा ऊपर लिखी बातों के बारे में सोच लेना। वरना फालतू की बातें करना बंद कर दो और करने वालों के दिमाग को भी ठिकाने लगाओ।

जय हिन्द जय भारत    

Thursday, April 28, 2016

संवाद जरुरी है - 2


24 अप्रैल 2016 को बच्चों की रेस थी जयपुर में जनपथ पर, यही कुछ 3 - 4 हजार बच्चों ने हिस्सा लिया होगा, फिर उन के पेरेंट्स और स्कूल के लोग भी थे लगभग उतने ही। हमेशा की तरह में तो दौड़ने से रहा लेकिन घूम कर सारी व्यवस्था तो देख ही सकते थे, तो घूमने लगा रोड पर, व्यवस्था बहुत बढ़िया की गयी थी हर थोड़ी दूरी पर पानी की छोटी -छोटी बॉटल्स के काउंटर्स थे, स्टार्टिंग पॉइंट पर एनर्जी ड्रिंक की व्यवस्था थी, मेडिकल रूम था सजावट भी अच्छी थी बस अनाउंसमेंट सिस्टम गड़बड़ था, रेस जिस रोड पर हो रही थी उस के किनारे वाले खम्बों  पर गुब्बारे लगाये गए थे, बहुत सुन्दर लग रहे थे।

रेस शुरू हुयी सब से पहले 10 KM वालों की फिर 5 KM वालों की और फिर 3 KM वाले बच्चों की, रेस शुरू होने के 5-7 मिनट बाद में सड़क पर आगे बढ़ा जहाँ बच्चे गए थे पूरी सड़क के साइड में प्लास्टिक की बॉटल्स पड़ी हुयी थी में ने मन ही मन सोचा "वाह रे विकास " इतने में ही कुछ बच्चे दौड़ते हुए आये हाथों में थैला लिए हुए और उन बॉटल्स को उठा के बचा हुआ पानी खाली  कर के अपने - अपने थैलों में डालने लग गये।  2-4 मिनट में ही सारी रोड साफ़ हो गयी। मुझे बड़े मजे आ रहे थे उन्हें देख कर, और इसी लिए मैंने उन के साथ एक सेल्फी भी ले ली

उनमें से एक एक छोटा बच्चा दूसरे से बोला " ओये देख कतरा सारा गुब्बारा लाग रया छ खंबा पे। " दूसरा बोला " नरा ऊंचा छ पण हाथ कॉन आवे। "
मैंने वो गुब्बारे निकाल कर बच्चों को देना शुरू कर दिया, बच्चे भी खूब सारे से थे सभी मेरे पास आ गए फिर क्या, पहले एक खम्बा फिर दूसरा और जैसे ही तीसरे खम्बे का नंबर आया एक सिक्यूरिटी गार्ड सीटी बजाने लगा।
मुझे थोड़ी हसीं आई और में उस गार्ड के पास गया और बोला - " भाई ये सब अमीरों के चोंचले हैं, देखा तुम ने ये बच्चे मोदी के 'स्वच्छ भारत अभियान' का पालन करने वाले हैं, थोड़े गुब्बारों से खेल लेंगे तो किसी का क्या ही बिगड़ जाएगा?"
उस ने बोला " साहब हम तो गुलाम हैं, हमें तो हुक्म बजाना है। "
में बोला " गुलाम नहीं हो, काम कर रहे हो और इस बात के पैसे ले रहे हो। पर ये सोचो कि इसी गुलामी की सोच के चक्कर में तुम किन की ख़ुशी छीन रहे हो और तब जब की उस से किसी और का नुक्सान भी नहीं हो रहा।"

पता नहीं ये उस गार्ड के लिए समझना मुश्किल था या आसान लेकिन उस ने मुझे खुद की एक कहानी सुनायी जिस में मेरी ही उम्र के एक अमीर सभ्य लड़के ने कैसे उस पर जुल्म किया था और उस के पैसे रोक लिए थे और पिटाई भी की थी क्योकि उस ने धूप में गेट पर खड़े होने की जगह साइड में एक पेड़ के नीचे खड़े होने की गलती करी थी और उस लड़के की कार के लिए गेट खुलने में देर हो गयी थी।
खेर इस बहाने मैंने 2 खम्बों के गुब्बारे और निकाल लिए और बच्चों को दे दिए और वो दौड़ते हुए उन थैलों  और गुब्बारों को ले कर चले गए।
Happy Ending :)

संवाद जरूरी है - 1

कल एक शादी में जाना हुआ, साथ में सगे-सम्बन्धी भी थे। बात खाना खाते हुए की है, हमारी टेबल पर 2 लड़के बहुत अच्छे से सर्विस दे रहे थे, मैंने ऐसे ही कजिन से बोला कि " कितने मेहनती लड़के हैं," वो बोली कि " ये टिप लेने के लिए इतनी मेहनत कर रहे हैं। " मुझे ये बात कुछ हज़म नहीं हुई , मैंने कहा कि सिर्फ यही एक कारण नहीं है, आदमी सिर्फ लालच के कारण ही मेहनत नहीं करता बल्कि कुछ और कारण भी होते हैं। हाँ इस बात पर हम दोनों agree कर रहे थे कि लालच भी एक कारण है पर हमेशा नहीं।
खैर इसी बीच मेरा मन हुआ कि इन लड़कों से बात करते हैं, मैंने नाम पता पुछा और पुछा की क्या पढ़ाई की है, तो पहले लड़के 'राधेश्याम मीणा' ने बताया कि उस ने 12वीं का एग्जाम दिया है और जो दूसरा लड़का है वो उस का बड़ा भाई 'शौक़ीन मीणा' है और सिविल इंजीनियर है। शौक़ीन अभी सरकारी नौकरी की तैयारी कर रहा है। और दोनों भाई घर चलाने के लिए शादियों में पार्ट टाइम लोगों की सेवा भी करते हैं।
हम दोनों भाई बहिन चुपचाप खाना खाने लगे और धीरे से बोले
" Hard Reality of Life" frown emoticon

Tuesday, August 5, 2014

एक महान पर्यावरणविद् – श्री कृष्ण

भगवान कृष्ण के मानवीय रूप का मानवीय आधार पर अगर विश्लेशण करें तो बहुत सी अचंभित करने वाली बातें समझ आती हैं।
श्री कृष्ण ने सभी पर्यावरण के तत्वों की रक्षा करी और सभी को बढाया। श्री कृष्ण ने प्रकृति के पांचों तत्वों को शुद्ध किया उन्होने कालिया नाग को मार कर जल तत्व को शुद्ध किया यमुना नदी को गन्दा होने से बचाया, त्रिणावतार को मार कर वायु तत्व को शुद्ध किया उसे जहरीली होने से बचाया, व्योमासुर को मार कर आकाश तत्व को शुद्ध किया, दावानल अग्नि को पी कर अग्नि तत्व को शुद्ध किया जंगलों को बचाया और मिट्टी खा के पृथ्वी तत्व को शुद्ध किया। इन सब कहानियों में राक्षस एक प्रतीक है प्रकृति को दुषित करने वाले कारणों का और उन सब का वध करना मतलब उन कारणों को दूर करना है।
श्री कृष्ण ने सिर्फ इतना ही नहीं किया, बृज में जमीन के अंदर का पानी खारा है इसलिये वहा सिर्फ वर्षा जल पर ही निर्भर रहा जा सकता है, शास्त्रो के अनुसार बृज में लघभग 1000 कुण्ड हैं जिन मैं से अधिकतर आपस में जुडे हुये है ताकि कही पर भी पानी की कमी और पानी की अधिकता से नुकसान ना हो जाये, अकेले गोवर्धन पर्वत के चारों तरफ 56 कुण्ड बनवाये और वो भी सब आपस में जुडे हुये ताकि बाढ का खतरा नहीं रहे और जो कुण्ड खुडने से मिट्टी निकली उससे कुछ ऊँचा स्थान बना के जमीन उठा ली जो की अधिक पानी के समय बचने के काम आ सके ।
श्री कृष्ण ने पशुधन की रक्षा व उस को बढाने के लिये गायें चरायी और इस बहाने ग्वालबालों की एक फौज खडी कर ली उस दुष्ट शाषक से लड़ने के लिये जो जनता के साथ अत्याचार करता था।
आज के परीपेक्ष्य में देखा जाये तो हम सब लोग प्रकृति के विपरीत काम करे जा रहे हैं छोटे से बृज में 1000 कुण्ड थे और आज के बड़े बड़े मेट्रोस में 1 छोटा सा पानी का सोर्स देखने को नहीं मिलता बस बारिश के टाइम पर सडको और शहर के गंदे नालो में पानी दिख जाता है। नदिया इस से गंदी नहीं हो सकती जितनी इन शहरों के पास है गटर के नाले जैसी नदिया हम लोगों ने बना दी है। आज सांस लेने के लिये शुद्ध वायु नहीं है पीने के लिये शुद्ध पानी नहीं है आकाश तक में हम ने कचरा फैला दिया है। धरती का सब कुछ छीन लिया है उसे खोखला कर दिया है, श्री कृष्ण भी सोचते होंगे की मेरी पूजा तो बहुत करते है लेकिन हैं तो सारे नास्तिक, पता नहीं कब हम सुधरेंगे। विकास की किस अवधारणा को ले कर प्रकृति के साथ खिलवाड करे जा रहे हैं इस अवधारणा पर पुनर्विचार करना होगा अन्यथा हम सब लोग बड़ी मुश्किल में फसने वाले हैं। और अभी कोई कृष्ण भी नहीं खडे हमे बचाने के लिये।

Friday, August 1, 2014

आत्म हत्या कि ओर एक कदम

                                                 
सुबह उठते ही मन में घबराहट होने लगी, एक सपना देखा था बहुत ही डरावना, बीसलपुर बांध, टिहरी बाँध, भाखड़ा नाँगल बाँध और नर्मदा बाँध  साथ टूट गये, दिल्ली  हरियाणा तक पानी ही पानी हो गया, राजस्थान बिन पानी के तड़पने लगा, पंजाब से चीख पुकारें सुनाई देने लगी गुजरात मध्यप्रदेश के लोग सोते सोते ही मर गये. एक दम से नींद खुल गयी  दिल दहल गया, रोंगटे खड़े हो गये सांस धीमे चलने लगी। इतना खतरनाक सपना ईश्वर कभी ना दिखाये और वास्तविकता मैं तो कभी भी नही। पर हम ने तो विनाश के बीज बो ही रखे हैं, फिर अखबार पढ़ा तो पता चला कि जयपुर, अजमेर, टोंक व कुछ अन्य जिले जिस बाँध से पानी पीते हैं वहां रोज़ 2 सेंटीमीटर जलस्तर कम होता जा रहा है और अगर २ साल बरसात नहीं आये तो इन सब जिलों के लोग पानी नहीं मिलने के कारण मर जायेंगे।
  सरकारें कितनी अदूरदर्शी हो सकती हैं, लोग कितने लालची सकते हैं, समाज कितना असंवेदनशील व बेवकूफ़ हो सकता है ये समझ आ रहा है।  जयपुर की लाइफ लाइन कहलाने वाला रामगढ़ बाँध जयपुर के लोगों के द्वारा ही मार दिया गया, निरंतर बहती गंगा और यमुना को शांत कर के गटर बना दिया गया, हर शहर के नीचे की जमीनों से पानी सोख लिया गया और उन्हें  खोखली कर दिया गया और अब भी  सुध नहीं है। 
   क्या करेंगे हम मैट्रो का, बुलेट ट्रेनों का, आठ लाइन की सुपरफास्ट सड़कों का, नये-नये हथियारों का, सोने के गहनों,LED टीवी और बड़ी बड़ी अट्टालिकाओं का जब पीने का पानी नहीं होगा और पानी की वजह से अन्न पैदा नहीं होगा?
   आम आदमी अपने आप को अब भी इन सब प्रश्नों के उत्तर ढूंढने में बेबस व लाचार समझता है। बस एक ही बार उसके हाथ काम करते हैं वोटिंग मशीन में उंगली रखने के फिर वो सोचता है जिस के निशान पर उंगली रखी है वो कुछ करेगा पर ये आशा, आशा ही रह जाती है। और जो लोग कुछ कर सकते हैं उनके लिए तो पैक्ड पानी हमेशा available रहता है तो वो ये सब सोचने की ज़हमत क्यों करने लगें।
  फिर ये सब कौन सोचेगा और कौन करेंगा? कौन जिम्मेदार है गंगा, यमुना, नर्मदा, और छोटी बड़ी बहुत सी नदियों की हत्या का, कौन जिम्मेदार है रामगढ़ की मौत का और खुद को व अन्य नागरिकों को आत्महत्या की ओर ढकेलने का?? और अब जो स्थिति बन गयी है उसे कौन सुधारेगा? ये बड़े बड़े बाँध बनना और छोटी नदियों, तालाबों, बांधों का सूखना देश की सुरक्षा की दृष्टि से भी घातक है और विनाश की दिशा में विकास है। समय रहते इस विकास की दिशा नहीं बदली तो फिर हमें तैयार रहना चाहिये अनदेखे, अनजाने, अनसुने खतरे को सहन करने के लिये क्यों कि उस वक़्त हम कुछ कर नहीं पायेंगे।
   सजा दो उन को जो ज़िम्मेदार हैं इस परिस्थिति के, बच्चे पैदा करने की जगह पेड़ लगाओ, जमीन से पानी सोखने की जगह जमीन को पानी पिलाओ, एक-एक बूँद बचाओ, मंदिरों मैं फूलों को तोड़ के चढाने की जगह मंदिर परिसर को ही फूलों के पेड़ों से भर दो ताकि भगवान को भी हमेशा ताजा फूलों की खुशबू आये। और जो भी कर सकते हैं वो करना शुरू करो, सोचो दिमाग लगाओ और काम पर लग जाओ नहीं तो अगली पीढ़ी का इन्तजार नहीं करना पड़ेगा ये पीढ़ी ही तड़प तड़प के मरेगी।